Tuesday, September 12, 2006

याद मे

१५ साल पूर्व आप दिव्यलोक मै पधार गये थे.आप के बाद ऐसा लगा जैसे दुनिया ही बेकार हो गई.लेकिन आपके आशीरवाद से हमने अपनी दिशा को एक नया आयाम दिया.मुश्किल परिस्थ्तियो मै कभी कभी विचलित हो जाते थे, पर ये सोच कर कि अब जो भी करना है वो सब हमारी जिम्मेदारी है.आप ने हमेशा ही इस बात्त पर जोर दिया है कि फ़ैसला हमेशा ही स्वय का होना चाहिये. आज जब हम आप का श्राद्ध कर रहे है तो आप बहुत याद आ रहे है. कभी कभी ऐसा लगता है कि आप के बिना सब कुच्ह बेकार है. आपका हम पर स्नेह बना रहे यही हमारी अभिलाशा है.

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